ओबेरॉय होटल के मालिक मोहन सिंह ओबेरॉय के संघर्ष व सफलता की कहानी

ओबेराय (होटल) समूह के स्वामी, मोहन सिंह ओबेराय भारत के उन उधोगपतियो में से है, जिन्होने अथक मेहनत और परिश्रम के बल पर ओबेराय होटल समूह का समाजय खड़ा किया। उनके धनी-मानी उधोगपति बनने के कहानी जहा काफी रोचक है, वही प्रेरणादायक भी है।

मोहन सिंह ओबेराय आर्थिक तंगी और पारिवारिक परेशानियों के चलते, मजबूरी होकर कॉलेज की पढ़ाई भी नहीं कर पाये थे।उनका जन्म भाऊंन कस्बे (अब पाकिस्तान) में हुआ था।

रोजगार की तलाश में इधर से उधर भटकते नंगे पांव ही शिमला पहुँच गए थे। यह सन 1922 के आसपास की बात है।वे शिमला इसलिए आ गये थे क्योंकि वह पर्यटन के लिए मशहूर इलाका था | देश और विदेश के पर्यटको का आना-जाना वहां लगा रहता था | उनके सफर का सामान ढोकर मजदूरी मिलने की काफी उम्मीद रहती थी | कुछ दिन उन्होंने मजदूरी में गुजारे ,फिर अचानक उन्हें सन 1922 में शिमला के सिसिल होटल में गेस्ट क्लर्क की नौकरी मिल गयी | यही से उनके भाग्य में करवट बदली | पर्यटको को होटल में लाकर ठहराने के समय उनकी जो मृदुभाषिता होती थी ,स्वागत भाव और विनम्रता होती थी ,उसने अर्नेस्ट होटल के मालिक मिस्टर अर्नेस्ट को खासा आकर्षित किया था | उनके पास होटल में गेस्ट क्लर्क की जगह खाली थी | मिस्टर अर्नेस्ट इस बात को जान चुके थे कि कॉलेज स्तर की न सही, पर मोहन सिंह ओबेरॉय इतना पढ़े-लिखे जरूर थे कि विदेशी पर्यटक से शालीनता से बात कर ,काम चलाऊँ अंग्रेजी में उनकी बात समझ सके और होटल की सुविधाओं के बारे में जानकारी देकर उन्हें वह ठहरने को बाध्य कर सके |

उनके सामने मिस्टर अर्नेस्ट ने जब नौकरी का प्रस्ताव रखा तो वे झट तैयार हो गये | तनख्वाह 50 रुपये महीना तय हो गयी | सन 1922 में 50 रूपये की काफी कीमत थी | मोहन सिंह जी अब नौकरी करने लगे थे | पर पैसे बचाने के लिए होटल परिसर में ही नौकरों के लिए बने क्वार्टर के ही एक कमरे में रहने लगे |

उनका ऐसा करना अर्नेस्ट के लिए भी लाभदायक और सुविधाजनक था | वे सोने के घंटे को छोड़कर हर समय होटल की सेवा के लिए तैयार रहते थे |

अपनी कड़ी मेहनत से उन्होंने जल्द ही अर्नेस्ट क्लार्क का भरोसा हासिल कर लिया | जिसका नतीजा यह निकला कि जब श्री क्लार्क 6 महीने की छुट्टी पर लंदन जाने लगे तो उन्होंने होटल का जिम्मा इस क्लर्क पर ही छोड़ दिया था | तब मोहन सिंह ने भी अपनी पत्नी ईसार देवी के साथ मिलकर होटल की व्यवस्था करने में कोई कसर नहीं छोड़ी | यहाँ तक कि मांस और सब्जियाँ खरीदने भी यह दम्पत्ति खुद ही बाजार जाता था | इसका नतीजा यह निकला कि होटल के खर्च में अच्छी खासी कमी आने लगी और होटल के कमरे भी भरे रहने लगे | होटल की आय दिन -प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी | इससे श्री क्लार्क काफी खुश हुए | उसके बाद श्री ओबेरॉय की किस्मत रंग लाने लगी | उन्होंने अपनी मेहनत जारी रखी |

फिर सयोंग ऐसा हुआ कि श्री क्लार्क ने लंदन जाकर बसने का विचार किया | ऐसे में श्री क्लार्क ने महज 25 हज़ार रुपये में ही अपना होटल बेचने की पेशकश कर दी | मगर श्री ओबेरॉय के पास इतने पैसे नहीं थे | तब उन्होंने अपनी पैतृक संपत्ति और पत्नी के गहने गिरवी रखकर यह होटल खरीद लिया | इसके साथ ही ओबेरॉय होटल समूह की नींव पड़ गयी थी | और फिर तो सिलसिला ही चल पड़ा | क्लार्क होटल का नाम बदलकर मोहन सिंह ने अपने सरनेम ‘ओबेरॉय ‘ पर होटल का नाम रख दिया |

एक स्थान पर स्वतंत्रता संग्राम के दौरान प्रमुख नेता मोतीलाल नेहरू की तरफ से मोहन सिंह ओबेरॉय को इनाम के रूप में 100 रुपये मिलने का भी ज़िक्र किया गया है | किताब ‘ओबेरॉय के संघर्षमय जीवन ‘के अनुसार,स्टेनोग्राफी की जानकारी रखने वाले श्री ओबेरॉय के होटल में ठहरे थे | श्री नेहरू ने शाम के समय एक बेहद अहम् रिपोर्ट टाइप करने के लिए दी थी | रात भर जागकर श्री ओबेरॉय ने वह रिपोर्ट टाइप करके जब सुबह के समय श्री नेहरू को सौंपी तो वह बहुत खुश हुए और बतौर इनाम 100 रूपये का नोट दिया | उन पैसे से उन्होंने पत्नी के लिए कलाई की घडी ,बच्चो के लिए कपडे तथा अपने लिए एक रेनकोट ख़रीदा था |

एक बार जब होटल प्रबंधन का कार्य श्री मोहन सिंह ओबेरॉय के हाथ में आया तो उन्होंने रुकने का नाम नहीं लिया | उन्होंने अपने पूरे जीवन-काल में होटल और रिसॉर्ट्स का ऐसा ढांचा खड़ा किया कि सम्पूर्ण दुनिया में ओबेरॉय समूह सफलता का पर्याय माना जाने लगा |

यदि आपके पास Hindi/English में कोई Article,Motivational/ Inspirational story या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी Email Idहै:successduniya@yahoo.com.पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे.Thanks!

132 views

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *